छŸाीसगढ़ी लोकगीतों में नारी-संवेदना
डाॅ. (श्रीमती) ज्योति पांडेय1, श्रीमती अन्नपूर्णा देवांगन2
1शोध-निर्देशक, उप संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, मंत्रालय, अटल नगर, रायपुर (छ.ग.)
2शोधार्थी, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर( छ ग
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
छŸाीसगढ़ में लोक-संस्कृति के अंतर्गत लोकगीत वाचिक परंपरा के द्योतक हैं। यहाँ पर लोकगीतों का समृद्ध भंडार है, जो लोक-जीवन के विभिन्न क्रियाकलापों के साथ ही मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। लोकगीत लोक-जीवन की अलिखित व व्यवहारिक रचनाएँ हैं, जो लोक-परंपरा से प्रचलित व प्रतिष्ठित होती है। लोकगीतों के रचयिता प्रायः अज्ञात होते हैं। वस्तुतः ये गीत समूहगत रचनाशीलता का परिणाम होते हैं तथा मौखिक परंपरा में जीवित रह कर युगों की यात्रा करते हैं। वे गीत कटुताओं, पर्वों, संस्कारों के अतिरिक्त धर्म व श्रम से भी संबंधित होते हैं।
छŸाीसगढ़ भले ही पिछड़ा प्रदेश है, पर यहाँ की नारियाँ स्वावलंबी हैं। पुरुषों पर निर्भर न रहकर अपनी मेहनत व ताकत से पुरुष-वर्ग के साथ बराबर कंधे-से-कंधा मिलाकर चलती हैं। गृह-कार्य ही नहीं यहाँ की स्त्रियाँ अपने बुद्धि, बल व चातुर्य से अपनी शक्ति प्रदर्शित करती हैं। छŸाीसगढ़ प्रदेश मातृसŸाात्मक प्रदेश रहा है, किंतु कालांतर में पितृसŸाात्मक व्यवस्था पनपने लगी और नारी का शोषण होने लगा। संस्कारित, मर्यादित छŸाीसगढ़ी नारी अपने मन की व्यथा कहने से सकुचाती कितने ही कष्ट सहन कर लेती है, किंतु होठों पर मुस्कान छाई रहती है।
KEYWORDS: लोकगीत, नारी, छŸाीसगढ।
प्रस्तावना
मध्यप्रदेश के दक्षिण में स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण प्रदेश ‘छŸाीसगढ़’ जो दण्डकारण्य, महाकान्तर, गोंडवाना, दक्षिण कोसल आदि नामों से अभिहित हुआ है। यहाँ की सांस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक विरासत, प्राचीन सभ्यता व संस्कृति की पहचान कराती इस प्रदेश की पुरावैभव की गाथा को प्रचारित करती है। छŸाीसगढ़ की संस्कृति आर्यों तथा अनार्यों की मिश्रित संस्कृति रही है, यहाँ की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि लोक-जीवन पर आधारित है इसलिए यहाँ की लोक-संस्कृति लोक-जीवन में समाहित होकर भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्फुटित होती है।
‘‘लोक शब्द की व्युत्पŸिा ‘लोक’ धतु से हुई है, जिसका अर्थ- देखना, प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना है। तद्नुसार लोक का निहितार्थ अत्यंत सूक्ष्म भी है और व्यापक भी। सूक्ष्म अर्थ में प्रत्येक व्यक्ति का लोक उसकी दृष्टि क्षमता कल्पनाशीलता पर निर्भर है। व्यापक अर्थ में तीन लेक- स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल हैं।’’1
छŸाीसगढ़ी लोकगीतों का इतिहास चिर-प्राचीन है, जो विशेष अवसरों पर सुनने को मिलते हैं, जिनमें अनेक प्रकार के संस्कार व धर्म संबंधित गीत देखने को मिलते हैं। भोजल-गीत, संझा-गीत, सोहर-गीत, बिहाव-गीत, बारहमासी, खेल-गीत, ददरिया, सुआ, करमा, देवार, डंडा, लोरी, जँवारा, गौरा-गीत आदि प्रमुख हैं। मिट्टी की महक लिए इन लोकगीतों में छŸाीसगढ़ प्रदेश की संस्कृति, सभ्यता, धार्मिक आधार, लौकिक व्यवहार, जन-चेतना का व्यवहारिक रूप प्रदर्शित होता है। ‘‘छŸाीसगढ़ी लोकगीत सामाजिक व्यवस्था की उपज है। घर और बाहर सर्वत्र स्त्री और पुरुष मिलकर जीवन-यापन करते हैं। परिश्रम के क्षण या चाहे नृत्य या सामूहिक मनोरंजन के क्षण स्त्री की आवाज़ पुरुष को छू कर चलती है।’’2
लेकगीत इनकी संवदनाओं को लोगों तक पहुँचाने का विशेष माध्यम रहा है। नारी अपने प्रति उच्छृंखल सामाजिक आचरण को विस्मृत करने हेतु इन गीतों का आश्रय लेती है, जिनमें सुआगीत, भोजली-गीत, जँवारा-गीत प्रमुख हैं। इन गीतों के माध्यम से स्त्री दूषित सामाजिक स्थिति से विमुख हो मानसिक शांति के लिए ईश्वर की ओर अभिमुख हो जाती है। करमा, ददरिया, बिहाव, आदि लोकगीतों में नारी के विभिन्न रूप तो मिलते ही हैं, साथ ही उसके अंतस की पीड़ा का भी सजीव चित्रण दृष्टिगोचर हाता है। कहीं पर माँ की ममत झलकती है, तो कहीं पर बहन का स्नेह उमड़ता है। जहाँ एक ओर भाभी का सजीला रूप मन को गुदगुदाती है, तो दूसरी ओर प्रेयसी या पत्नी के रूप में पुरुष-वर्ग को आकर्षित भी करती है। नारी का हर स्वरूप जीवन की संपूर्ति के लिए अनिवार्य है।
स्वयं नारी ने तथा अज्ञात कवियों ने नारी की संवेदनाओं को अपने शब्दों में ढाल कर गीतों की जो रचना की है, उससे नारी-मन की व्यथा, पीड़ा की जो अनुभूति होती है, वह यकीनन आज भी पीड़ादायक है।
धार्मिक मान्यताओं को आधार स्त्री-वर्ग से ही प्राप्त होता है। धर्म की मर्यादा, संस्कार, व्रत, त्यौहार को छŸाीसगढ़ की नारियों ने बड़े जतन से अभी तक सुरक्षित एवं जीवित रखा है। वर्षा ऋतु में जब चहुँओर हरितिमा बिखरी होती है, तब यहाँ की कन्या के द्वारा सावन शुक्ल अष्टमी को खाद मिश्रित मिट्टी में गेहूँ, धान, जौ और उड़द के दानों को बोया जाता है, फिर सांयकाल भोजली देवी का स्तवन करती बालाएँ अपने घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती है-
‘‘देवी गंगा, देवी गंगा
लहर तुरंगा
तुमरो लहर में देवी
भींझे आठों अंगा
पानी बिन मछरी पवन बिन धाने
सेवा बिन मछरी पवन बिन धोने
सेवा बिन भोजली के तरसथे प्राने
देवी गोसंइया गरब झन करिहव
भइया भतीजवा रे अमर भये रइहव
जय हो देवी गंगा।’’3
इस तरह कुंवारी कन्याएँ समूह में माता की विभिन्न प्रकार की सेवा करती हुई, अपने पिता, भाई, भतीजा की सलामती की प्रार्थना करती है। इसी तरह गैारा-गीत में भी वह अपने परिवार की सुख-शांति की आशा से माता पार्वती और भगवान शंकर का पूजन करती है-
‘‘एक पतरी रैनी भैनी
रामरतन ओ दुर्गा देवी
तोरे शीतल छांव माय।’‘
गोंड़ छŸाीसगढ़ की बहुसंख्यक जनजाति है। इस जाति की महिलाएँ भगवान शिव और गौरा की अराधना करते अपने सामाजिक और धार्मिक परंपरानुसार उनका (अपने आराध्य) विवाह कराती हैं। लोक-मान्यता है कि ये गोड़ जनजाति शंकर-पार्वती की संतान हैं।
छŸाीसगढ़ की नारियों में विवाहोपरांत अपने परिवार की सुख-समृद्धि की आकांक्षा सदैव बनी रहती है, किंतु अविवाहित बालाएँ भी इस संवेदना से विमुख नहीं वरन् अपने पिता, भाई की रक्षा और संपन्नता की कामना करती ईश्वरीय आराधना कर अपने कर्Ÿाव्य का निर्वहन सहजता से करती हैं। संझा-गीत छŸाीसगढ़ की धार्मिक परंपरा का लोकगीत है, जो क्वाँर माह में कुँवारी लड़कियों द्वारा संध्या देवी के वंदन, स्तवन, पूजन करके की जाती है-
‘‘हमरे संझा जो मांगिनि
मोंगरा कइरे फुलवा
तोरई पान के बरना
तोरे आश गये तोरे पाथ गये
तोर लिल्ली सिंघोड़ा
कुदावत बइठे
सालों से सुवाना पढ़ावत बइठे।’’4
सुंदर वर, चिर सौभाग्य के साथ ही सुखद दाम्पत्य जीवन की कामना लिए देवी की स्तुति करती बालाएँ पारंपरिक दायित्व निभाती नज़र आती हैं।
छŸाीसगढ़ी सोहर-गीत में गर्भवती स्त्री की भावनाओं, उसके शील- संकोच, उसके हर्ष और वर्तमान शारीरिक बनावट का सुंदर चित्रण तो होता ही है, साथ ही ससुराल पक्ष के प्रति खीझ का भी वर्णन मार्मिकता के साथ प्रस्तुत होता है। महाकवि कालिदास की लेखनी ने रानी सुदक्षिणा की गर्भावस्था का वर्णन प्राप्त होता है-
‘‘शरीरसादादसमग्रभूषणा पमुखेन
साऽलक्ष्यत लोध्र पांडुना।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका
प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी।।’’5
महाकवि कालिदास की लेखनी में साक्षात् सरस्वती का निवास था। उनकी लेखनी से प्रस्फुटित श्लोक में गर्भिणी स्त्री का जो चित्रण प्राप्त होता है, छŸाीसगढ़ी सोहर-गीत में वही माधुर्यशीलता और विषदता दृष्टिगोचर होती है। सोहर-गीत पर मुक्तक रूप में तो कहीं पर प्रबंध रूप में नारी मनोदशा का वर्णन करता है-
‘‘नंनदी बोलायेव उहू नइ आइस।
ननदी हो हमार का करि लेहव।।
बहिनी बलाके कांके मढ़ईबोन।
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।।
सासे बोलायेंव उहू नइ आइस।
सासे हो हमार का करि लेहव।।
दाई बला के ठुठू बंधवइबोन।
हम छबीली सबे के काम पड़बोन।।’’6
ससुराल में उपेक्षित (बहू) नारी बच्चे के जन्म समय अपने ससुराल वालों से अपनी सहायता की अपेक्षा करती है, किंतु सभी उसके प्रति उपेक्षा भाव रख उसकी मदद नहीं करते, तो वह निराश तो होती है, परंतु मायके पक्ष की उपस्थिति से वह संतुष्ट भी हो जाती है।
बिहाव-गीत छŸाीसगढ़ का ऐसा लोकगीत है, जिसमें स्त्री की संवेदनाओं का भिन्न-भिन्न रूप देखने को मिलता है। विदाई के समय गाये जाने वाला गीत इतना कारुणिक होता है कि करुणा भी रो उठती है और धीरज भी धैर्य नहीं रख पाता और माता-पिता के साथ बेटी भी कह उठती है-
‘‘बरम्हा के बेटी नइये का
बिदा के दुख नइ जानय
बेटी जाय झन देतीस
झन कहे कोनो मनाय
एक तो बेटी झन होतिस
होतिस त बिदा झन होतिस।’’7
ब्रह्मा ने स्त्री की रचना ही क्यों की ? घर छोड़ती बेटी की कातरता, मजबूरी भला एक माँ से कैसे छुप सकती है। माँ-बेटी के प्रेम-संबंधों की बड़ी मार्मिक और कारुणिक वर्णन ही गीतों का प्रबल पक्ष है। माँ का हृदय व्यथित हो अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से विलग करते हुए द्रवित होकर कह उठती है-
‘‘संसार के जतका दुख है।
फेर बेटी बिदा ले छोटे।।
दावां दिल में लग जाये।
जिव ला कुछ चाबे खोटे।।‘’
माँ की ममता और प्यार का सहानुभूतिपूर्ण संवेदना भारतीय लोकगीतों की आत्मा के रूप में प्रमाणित है।
तीज-पर्व छŸाीसगढ़ प्रदेश का एक महान पर्व है। यहाँ पर हरितालिका व्रत बेटियाँ मायके में ही करती है। तीज पर्व के लिए पिता, भाई या भतीजा लिवाने आता है। महीनों पहले नारी पीहर जाने के उल्लास से उल्लासित हो लेनहार का रास्ता देखती रहती है-
‘‘तीजा परब हा कब आही
उवत सुरूज अऊ बूड़त सुरूज
के संगे मा
देखत रहिथों में ह रद्दा ला
भादो के भागती पानी हा भागही
तीजा ह लकठाही
मोर दाई-ददा-भाई हा आही
मोला तिजहारिन बनाके लेगही।’’
ससुराल में अपने कर्Ÿाव्य का निर्वहन करते-करते बेटियों के लिए पिता का घर देहरी तो परबत भया, अंगना भया विदेश जैसा हो जाता है। अपनी भावनाओं को समेटे, बचपन की यादों के साथ कुछ पल माता-पिता, भाई-बहन के साथ जीना चाहती है, इसलिए इस क्षेत्र की नारी को तीज पर्व की प्रतीक्षा रहती है।
नारी के अंतस की पीड़ा सुआ और ददरिया-गीतों में दृष्टिगोचर होती है। वह पुरुष समाज के द्वारा दी गई ताड़ना तथा पीड़ा का प्रतिकार करती प्रताड़ना से विह्वल हो कह उठती है-
‘‘पइयां परत हो चंदा सुरूज रे
मोला तिरिया जनम झनि देय सुआ रे
तिरिया जनम मोर अति कलपना रे
मोला तिरिया जन झनि दे सुआ रे।’’9
शुक यानि तोता को माध्यम बनाकर अपनी व्यथा को प्रकट कर शोषित नारी चंद्रमा-सूर्य से प्रार्थना करती है कि अगले जनम में मुझे स्त्री रूप में जन्म न मिले, क्योंकि नारी का जीवन बहुत ही दुखदायी है, जिसकी कोई सीमा नहीं है।
छŸाीसगढ़ की स्त्री कहीं पर शोषकों द्वारा दिए गए कष्टों को सहन लेती है, किंतु कहीं-कहीं पर वह विद्रोह भी कर देती है, तथापि शील और संस्कार की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती। पुरुष से परे अपने अस्तित्व की कल्पना भी उसके लिए अकल्पनीय है। भारतीय संस्कारों से संस्कारित इस प्रदेश की स्त्री असहनीय कष्टों और संतापों को भी सहजता से सह जाती है। सुआगीतों में नारी-संवेदना उभर कर आती है।
ददरिया जो छŸाीसगढ़ प्रदेश का प्रमुख प्रणय-गीत है। रति भाव के सभी दशाओं, रागों-अनुरागों का प्रतिनिधित्व करता ददरिया मौलिकता, निजता और विशिष्टता लिए नारी-मन की प्रेम व्यंजना का अलौकिक आभास कराता है। ददरिया-गीतों में नारी के मनोभावों को अज्ञात कवियों ने संयोग एवं वियोग दोनों ही रूपों में बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है।
संयोगावस्थाः
1. ‘‘भांटा के पानी दमौरी के चार
मिठ बोलना दे दे राजा नइ मरना हे सार।’’
2. ‘‘बागे बगइचा कदम झाड़ी
बलिहारी तोर रेंगना नदी ले ताड़ी।’’10
स्वभाव से भावुक व नाजुक नारी को सदैव ही पुरुष की प्रतीक्षा रही है।
वियोगकालः
‘‘चंदा के बैरी कारी बटुरी रे
तिरिया के बैरी दूनो नयन।’’11
अर्थात् चंद्रमा का दुश्मन तो काली बदली है, पर स्त्री का शत्रु उसके दोनों नयन हैं। वियोगकाल में नारी सीधे-सीधे अपनी व्यथा न कह कर प्रकृति के संवेदनात्मक प्रतीकों के द्वारा अपनी वेदना व्यक्त करती है।
शोषित नारी शोषितों के प्रति अपना विरोध प्रकट करती है, किंतु सत्याग्रह का संकल्प लिए समाज को न्याय के लिए प्रेरित करती है। बाल-गीतांे में भी कहीं-कहीं पर नारी-मन की व्यथा देखने को मिलती है, जिसकी वजह है सामाजिक कुव्यवस्था और इन विसंगतियों के प्रति उसके मन में असंतोष व्याप्त है। फुगड़ी-गीत में अपना असंतोष कुछ इस तरह प्रदर्षित करती हैं-
‘‘एक गोड़ में लाल भाजी
एक गोड़ में कर्पूर
कतेक ला मानव मय
देवर ससुर।’’12
एक पैर में लाल भाजी (भाजी की एक प्रजाति) और एक पग में कर्पूर होगा, मैं कहाँ तक देवर और ससुर की मर्यादा स्वीकार करती रहूँगी।
किसी भी युग में, किसी भी क्षेत्र में, किसी भी कवि की लेखनी से नारी का जिक्र न हो, यह असंभव है, फिर लोकगीत तो लोक-जीवन की परिधि के अंतर्गत ही आता है। छŸाीसगढ़ में डंडा-गीत पुरुष गीत-नृत्य है और यह उन जातियों का प्रिय रहा है, जो सगुण भक्तिधारा से जुड़े रहे, किंतु फिर भी डंडा लोकगीत में कहीं पर नारी के जेवरों का सुंदर चित्रण देखने को मिलता है, तो कहीं पर नारी के वियोगकाल की साक्षी बन स्वयं ही नारी-व्यथा को प्रदर्शित करती है-
‘‘रैया रतनपुर मइके
रे समुरे ओडियान
बीच में बहिगे नदी कोइली
बिन पानी के धार रे भाई।’’13
वियोग छŸाीसगढ़ के लोकगीतों का प्रमुख विषय रहा है, क्योंकि यहाँ पर पुरुष-वर्ग धनार्जन के लिए दूसरे प्रदेशों को चले जाते हैं। उनके जाने के बाद महिलाएँ अनेकों परेशानियों से जूझते परिवार के प्रति अपने कर्Ÿाव्यों का निर्वहन करते प्रिय-मिलन को व्याकुल रहती है-
‘‘माया ल तै कस के टोरे सुरता मोर भुलाई
मोर मड़इया सूना करके कहां करे पहुँचाइ
चोला रोंवत हे राम बिन देखे परान।’’14
करमा-गीत में विरहणी नायिका बहुत ही व्याकुल हो रही है-
‘‘ऐ दीदी मोर पिया गे परदेस
न कोनो आवे न कोनो जावे
न भेजे संदेश पिया गे परदेस।’’15
लोकगीतों के रचनाकार केवल पुरुष ही नहीं वरन् स्त्री-वर्ग ने भी अपने मनोभावों को व्यक्त करने इन गीतों का सृजन किया। यहाँ की स्वावलंबी नारी मेहनत से नहीं डरती, न ही परेशानियों से घबराती है, किंतु जब समाज का एक वर्ग इनका शोषण कर इन्हें असहाय बनाने पर तुला होता है, तो वह आक्रामक स्थिति को भी धारण करने से नहीं चूकती। जहाँ वह माँ बन ममता न्यौछावर करती है, वहीं काली बन दुष्टों क संहार करने से नहीं कतराती।
संपूर्ण भारत समेत छŸाीसगढ़ के पुरुष-वर्ग में तानाशाही सामंतवाद की भावना प्रबल है, वह स्त्री को तुच्छ मानकर उसका तिरस्कार करता है, उसकी उपेक्षा करता है। धनाढ्य पुरुषों के चाटुकार जब उनकी हाँ-में-हाँ मिलाते हैं, तो यह विडंबना स्त्री-वर्ग की सामाजिक स्थिति का आभास कराती है। मड़ई-गीत नारी की इसी स्थिति का प्रमाण दे रही है-
‘‘गोल्लर बइला के सींग म देंखव माटी
ठाकुर पहिने सोन चांदी ठकुराइन पहिने घांटी।’’16
सामाजिक कुव्यवस्था को प्रमाणित करता यह लोकगीत आज भी कितनी समसामयिक है। आज भले ही नगर में महिला-पुरुष को बराबर मानने की असफल चेष्टा की जाती है, किंतु पितृसŸाात्मक भारतीय समाज में आज भी नारी उतनी ही उपेक्षित है। एक ओर जहाँ शक्तिस्वरूपा देवियों की आराधना करता पुरुष-समाज अपने को सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित करने में किसी भी स्तर तक पहुँच जाता है। वहीं नारी आज भी अपने को शक्तिहीन समझ पुरुष आधिपत्य को ही अपनी नियति मान समर्पित है।
निश्कर्ष:
छŸाीसगढ़ी लोकगीतों में नारी की संवेदना को अज्ञात रचनाकारों ने बड़ी ही सजीवता से प्रस्तुत किया है। नारी संस्कार, शील, मर्यादा की मूर्ति है, जो पुरुष की पैशाची वृŸिा के समक्ष अपने दैवीय स्वरूप को असमर्थ पाती है। यह छŸाीसगढ़ ही नहीं पूरे भारतवर्ष की परंपरा रही है कि स्त्री-पुरुष वर्ग की कुचेष्टा का शिकार सदियों से बनती रही है। छŸाीसगढ़ी नारी भले ही अशिक्षित हो, किंतु शील, मर्यादा, संस्कार रूपी शिक्षा से शिक्षित हो समाज में मिसाल कायम करती रही है। अपने अंतस की पीड़ा को व्यक्त करते हुए भी वह मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती। उस वेदना को वह प्रकृति के संवेदनात्मक प्रतीकों से प्रदर्शित करती है। सुआ, करमा, ददरिया, भोजली, गौरा आदि सभी प्रकार के लोकगीतों में हमें छŸाीसगढ़ी नारियों की संवेदनाओं का चित्रण प्राप्त होता है।
संदर्भ:
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3. वही, पृ. 191.
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14. वही, पृ. 211.
15. वही, पृ. 226.
16. वही, पृ 220.
Received on 04.06.2019 Modified on 11.06.2019
Accepted on 17.06.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):457-462.